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पूजन
महाप्रकाश अर्धमातास्य, अधर््नारी मां पुत्र पुत्री का चरण स्पर्श
भवः अर्धनारी मां ने संकल्प लेकर अपने मानव पुत्र और पुत्री को साथ
में लेकर 1008 चक्र पूजन को प्रथम बार मानव लोक में करवाया है।
ध्यान ||
पूजन
महाप्रकाश अर्धमातास्य, अधर््नारी मां पुत्र पुत्री का चरण स्पर्श
भवः अर्धनारी मां ने संकल्प लेकर अपने मानव पुत्र और पुत्री को साथ
में लेकर 1008 चक्र पूजन को प्रथम बार मानव लोक में करवाया है।
ध्यान
अन्नतः पुत्र तु तत्कृत्वाः महाप्रकाश अर्धामातास्य, प्रदधात्
अर्धनारी नारी मां छाया पात्र विद्यानतः मां शिवपुत्रस्य गोदनाम नमः
पुजन अर्धयोगिनी मां के अशिवाद से फलपूर्ण सिद्ध ।
न्यास अस्त श्री नारायण हृदय स्त्रोतम् भाग्र्गऋषि अनुष्टुछन्दः श्री
मां अर्धयोगिनी मातास्य देवता की लकम् जयेः विनियोगः
ध्यान -ंउचय अव्यकता द्रव्यक्तयः सर्वा प्रभवन्त्यध्यगमें रात्रयग् प्रलीयन्तेः
तत्रैवाव्यक्त संज्ञके। अर्धयोगिनी मातास्य समस्त मां देवता समस्त पूज्यामि
नमः नमम करोति।
पूजन -ंउचय ऊँ अहिमा ऊँ अगुलिस्तान् नमः (शरीर मनवाणी और शरीर से
किसी प्रकार का किसी को कष्ट न देना) ऊँ सत्यम-ंउचयसहस्त्रनाम (प्रिय भाषण
अपना उपकार करने वालो पर भी क्रोध न करना)
ऊँ अक्रोध -ंउचय मस्तिस्क वाण नमः (क्रोध करने वालों पर भी क्रोध न
होना)
आसन पूजन -ंउचय ऊँ आधार शक्तेय नमः (आसन के निचे जल छिड़कर)
ऊँ अर्धयोगिनी मां समस्त भैरवा नमः शिवाय
ऊँ अर्धयोगिनी मां समस्त भैरवा अनामिकाभ्याम् नमः
ऊँ अर्धयोगिनी मां समस्त भैरवा तर्जनिभ्याम् नमः
ऊँ अर्धयोगिनी मां समस्त भैरवा अनुष्ठाभ्याम् नमः
ऊँ अर्धयोगिनी मां समस्त भैरवा मध्यमाभ्याम् नमः
ऊँ अर्धयोगिनी मां समस्त भैरवा अस्त्राय फट्
ऊँ अर्धयोगिनी मां समस्त भैरवो नमः शिवाय
अर्धतत्व अर्धयोगिनी मां के मुख के अर्धतत्व समस्त योगिनी
मातास्य समस्त गुरु समस्त भैरवा समस्त मां के आर्शिवाद से अर्धयोगिनी
मां ने अपनी तरह अपने दो पुत्रों को एक साथ अपने साथ स्थापित किया।
जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित:।
यदा न हि अनुषज्जते तदा उच्यते यदा -ंउचय जिस काल में न-ंउचय न तो ही-ंउचय ही
अनुषज्जते -ंउचय आसन होता है तदा -ंउचय काल में उच्यते -ंउचय कहा जाता
है
महाकाल युग में प्रवेश करके मां ने यह श्लोक ध्यान श्लोक
को अपने पुत्रों को परमात्मा अर्थात परमेश्वर अर्थात परमपिता
अर्थात स्वयं मां का सम्पर्क ज्ञान हो इस लिये मां ने यह ध्यान
महाकाल युग जिसको मां ने अमृत पुत्रों के साथ प्रवेश किया
हैं उसी के लिये यह ध्यान लिखवाया है।
चक्र पूजन चालू