|| नमामि च महादेव्य गुरु गुरुम् नमः
नमोः नमामि:याथास्तु ||
महाप्रकाश अर्धमां अर्धनापर मां पुत्र पुत्राणी चरण स्पर्श -ंउचय
गुरु की कृपा से शक्ति जागृत होती है अपना प्रयत्न साथ में करना
अतिआवश्यक है। हजारो हजार साल बीत गया चार युग बीत रहा है या नही यह कलि
की परिवर्तीत आवस्था है। अभी तक अनेको अनेक सिद्ध पुरुष हुए है पर
जितनी भी साधना उन्होने की वह काल राज्य के अन्तर्गत की है सिद्ध पुरुष
चिरकाल से रहे है और रहेगे। वह काल के भीतर रहकर ही सिद्ध हुए है। पर
वह खण्ड वस्तु (काल) के अन्द ही सिद्ध है पर वह महाप्रकाश में तो सिद्ध
नही हुए है।
इनके लिए दहर विद्या की आवश्यकता होगी शुद्ध वस्तु रुदय है। भगवान
की स्थिति श्री कृष्ण के मुख से रुदय आकाश में अवस्थीत होने का कहाँ
है रुदय ही दहर आकाश है इसके खुल जाने पर महाप्रकाश अविमूर्त हो
जायेगा। दहर राज्य में चारों तरफ ऊपर निचे सब तरफ से शक्ति प्रवाहित होती
रहती है। इसके खुल जाने से महाप्रकाश होगा महाप्रकाश हाने पर काल
का संकोच मिट जायेगा यही दहर राज्य हैं जहाँ भगवान का आत्म प्रकाश
है वहां काल नहीं भगवान ही निव्यकिशोर से अन्तकान्तक और
अन्तकान्तक से नित्यकिशोर हैं। महाप्रकाश में सृष्टि और प्रतष् नहीं है
केवल महाप्रकाश में महासत्ता का आत्म प्रकाश है यह कितना अद्म
संयोग है की काल के अन्दर रहते हुए भी काल उसे छू न सकता। जितात्मन
ः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः यदा न हि अनुषज्जते तदा उच्चते । न -ंउचयन
तो हि-ंउचयन तो हि नतो अनुषज्जते बासन होता है। त-सजय़ -ंउचय काल में
उच्चते -ंउचय कहा जाता है।
कितना अदभूत है यह सम-हजयने का प्रयास करें यह नई चीज है। जो अभी तक
पृथ्वी पर नही हुई है। इससे एक व्यक्ति, दो व्यक्ति होते हुए सारा विश्व जिस
महासत्ता से उदर हुआ है उसी में विलीन हो जायेगा और केवल
महासत्ता का महाप्रकाश होगा। सत-हजयने की चीज है काल के अन्दर रहते हुए
भी मोक्ष आत्मसत्ता प्राप्त की जा सकती है। संसार के अलग अलग धर्म के
मानने वाले लोग अपने अपने धर्म को अपने रीति के अनुसार इसे प्राप्त किया
जा सकता है। कुछ बौद्ध धर्म को मानने वाले एवं सहजिता ने इसके अंश
ज्ञान को प्राप्त किया था। कुछ व्यक्तिगत इसाई और मुस्लिम धर्म के
मानने वाले का इसका अंश ज्ञान था ।
जो भी लोग काल संसार में रहेगे सबको वहा स्थान मिलेगा केवल
प्राणो में बेचैनी और व्यग्रता होनी चाहिए । उसी को अधिकार प्राप्त
होगा। गुरु जी के शिष्य पंड़ित गोपी नाथ कविराज जी ने अपनी पुस्तक
शक्ति का जागरण और कुण्डलिनी नामक पुस्तक में उसके अन्तिम अध्याय
महाप्रकाश का आत्म प्रकाश में अपने अन्तिम समय में इसका वर्ण किया था
जिसका की उन्हे पूर्व आभास हुआ था।
उन्होंने कहाँ कि समय आ गया हैं और जो नवमुण्डी पीठ है।
कि नही काल से वहाँ जाने के लिए ही नवमुण्डी है। यह उन्होंने श्री
श्रीमाता आनन्दमयी वाराणसी आश्रम में कहीं थी।
इस महाप्रकाश का उदय पूर्ण आत्म तत्व से हुआ है। अर्धनारी
मां ने शिव पुत्र शिवपुत्री कि आत्मा को एकल कर पूर्ण आत्म तत्व किया
यही नित्य किशोर से अन्तकान्तक से नित्यकिशोर है। सार विश्व अर्धतत्व से
संचालित होता है पर महाप्रकाश के आगमन के लिए पूर्ण विशूद्ध ततव की
आवश्यकता थी जो हमारी मां महाप्रकाश अर्धा मां और अर्धनारी मां
अपने (शिव शक्ति) पुत्र पुत्री को लेकर पृथ्वी पर महाप्रकाश का अवतरण
किया। यह सम्पूर्ण का ल राज्य के ऊपर की वस्तु हैं। यहाँ केवल महाप्रकाश
है। महाप्रकाश में सृष्टि और प्रलय नहीं हैं केवल महाप्रकाश हैं
जिसमें महासत्ता आत्मप्रकाश है।
आप किसी भी देवी देवता की साधना या उपासना के द्वारा बिना शैव
और वैष्णव के भेद द्वारा हृदय से उच्च उत्कणा और हृदय के योग के
द्वारा, हृदय से प्रेम भावना द्वारा वहा पहुंचा जा सकता है। इसी साधना है।
इसी साध्ना को मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।